C1

योरूबा में औपचारिक और सभामंच की भाषा

Ìrísí Ọ̀rọ̀ Àgbà àti Àṣà

यह लेख Settemila Lingue पर योरूबा व्याकरण-वृक्ष का हिस्सा है।

संक्षेप में

योरूबा की औपचारिक भाषा में केवल कठिन शब्द नहीं आते; वक्ता अभिवादन, आदरसूचक संबोधन और विचार रखने के ढंग से श्रोताओं का सम्मान करता है। Ẹ किसी समूह को या सम्मानपूर्वक एक व्यक्ति को संबोधित कर सकता है, जबकि ẹ jẹ́ kí… किसी बात की अनुमति माँगने या मिलकर कुछ करने का प्रस्ताव रखने में उपयोगी है। समारोह और परंपरागत सभाओं में इसके साथ प्रशस्ति, कहावत और लयबद्ध दोहराव जुड़ सकते हैं, लेकिन हर औपचारिक बातचीत में इन सबकी आवश्यकता नहीं होती।

परिचय

किसी स्थानीय सभा में बोलने, बड़ों के सामने सुझाव रखने और समारोह में स्वागत करने के लिए एक ही तरह की योरूबा पर्याप्त नहीं होती। शब्दार्थ सही होने पर भी सीधा आदेश रूखा लग सकता है; दूसरी ओर, छोटी बैठक में लंबी प्रशस्ति अनावश्यक लग सकती है। यहाँ भाषा-शैली से आशय उसी चुनाव से है जो वक्ता अवसर, संबंध और उद्देश्य के अनुसार करता है। इस विषय का योरूबा नाम Ìrísí Ọ̀rọ̀ Àgbà àti Àṣà है।

C1 स्तर पर लक्ष्य सिर्फ विनम्र वाक्य याद करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि किस वाक्य से वक्ता अपने लिए बोलने की जगह बनाता है, किससे श्रोताओं को साथ लेता है और किससे असहमति को नरम करता है। परंपरागत राजदरबार या परिषद, सामुदायिक समारोह और आधुनिक सार्वजनिक भाषण इन साधनों का अलग-अलग अनुपात में उपयोग करते हैं। किसी एक जगह की रीति को पूरे योरूबा समाज का अपरिवर्तनीय नियम नहीं मानना चाहिए।

हिंदीभाषी पाठक के लिए “तुम/आप”, “कृपया” और “आइए” उपयोगी शुरुआती तुलनाएँ हैं। फिर भी योरूबा की सम्मान-व्यवस्था हिंदी की नकल नहीं है: आदर दिखाने के लिए हिंदी जैसी क्रिया के अंत में “हैं” लगाने की व्यवस्था नहीं अपनाई जाती। संबोधन, सर्वनाम और पूरे कथन का ढंग मिलकर सम्मान व्यक्त करते हैं।

यह शैली कैसे काम करती है

१. पहले संबंध और अवसर पहचानें

बोलना शुरू करने से पहले तीन बातें तय करें: आप किसे संबोधित कर रहे हैं, अवसर कितना औपचारिक है और आपका उद्देश्य क्या है। स्वागत में पहले आभार और अभिवादन उपयुक्त हो सकते हैं; किसी विवाद पर विचार रखते समय पहले बोलने की अनुमति और साझा उद्देश्य स्पष्ट करना उपयोगी होगा।

बड़ों या पदधारियों का उल्लेख करते समय उनके स्वीकृत संबोधन का प्रयोग करें। हिंदी के “माननीय अध्यक्ष महोदय” को शब्द-दर-शब्द बदलकर कोई नया योरूबा संबोधन बना देना सुरक्षित उपाय नहीं है। स्थानीय रूप और संबोधन का क्रम किसी जानकार वक्ता से जाँचें, विशेषकर परंपरागत दरबार में।

२. आदरसूचक रूप चुनें

सर्वनाम यानी नाम की जगह आने वाले “मैं”, “आप” जैसे शब्द यहाँ विशेष महत्त्व रखते हैं। o एक परिचित व्यक्ति के लिए सामान्य “तुम” है; ẹ कई लोगों के लिए “आप सब” भी है और एक व्यक्ति के लिए सम्मानसूचक “आप” भी। लिखित वाक्य के आरंभ में यही रूप Ẹ दिखाई देता है।

योरूबा हिंदी अर्थ प्रयोग का अंतर
O káàárọ̀. तुम्हें सुप्रभात। परिचित एक व्यक्ति के लिए।
Ẹ káàárọ̀. आपको सुप्रभात। / आप सबको सुप्रभात। सम्मान या श्रोताओं की संख्या के अनुसार अर्थ निकलता है।
Mo dúpẹ́ lọ́wọ́ rẹ. मैं तुम्हारा आभारी हूँ। परिचित एक व्यक्ति के प्रति आभार।
Mo dúpẹ́ lọ́wọ́ yín. मैं आपका आभारी हूँ। / मैं आप सबका आभारी हूँ। सम्मानसूचक या बहुवचन रूप।

यहाँ rẹ और yín का अंतर भी याद रखें। केवल शुरुआत में सम्मानसूचक अभिवादन करके आगे परिचित संबोधन पर उतर जाना, यदि जानबूझकर न किया गया हो, असंगत लग सकता है। हालाँकि इन चार रूपों को देखकर यह न मानें कि हर जगह एक रूप को दूसरे से यांत्रिक ढंग से बदला जा सकता है; वाक्य में उसका काम भी देखना होगा।

३. आदेश के बजाय प्रस्ताव या अनुमति

Ẹ jẹ́ kí n sọ èrò mi. का अर्थ है “मुझे अपनी राय रखने दीजिए।” इसमें jẹ́ kí किसी काम को होने देने का ढाँचा बनाता है और n बताता है कि बोलने वाला स्वयं वह काम करेगा। Ẹ jẹ́ kí a… में a “हम” का भाव लाता है: “आइए, हम…”।

दोनों का उद्देश्य एक नहीं है। पहले में वक्ता अपनी बात रखने की जगह माँगता है; दूसरे में पूरे समूह को साझा कार्य के लिए आमंत्रित करता है। हिंदी के “मुझे बोलने दीजिए” और “आइए, हम बात करें” के बीच भी यही व्यावहारिक अंतर है।

Ẹ jọ̀ọ́ “कृपया” के निकट एक विनम्र अभिव्यक्ति है। इसे जोड़ना उपयोगी है, लेकिन इससे कोई अनुचित माँग अपने-आप उचित नहीं हो जाती। सम्मान वाक्य की पूरी बनावट और अवसर से आता है।

४. विचार को आगे लाकर उसका विस्तार करें

Ohun tí… का अर्थ प्रायः “जो बात…” या “वह बात जो…” होता है। tí पिछले शब्द को आगे के विवरण से जोड़ता है। इससे वक्ता किसी विचार को पहले सामने रखकर उसके बारे में आगे कह सकता है।

Ohun tí a bá máa wi, ẹ jẹ́ kí a fi ọgbọ́n wi í. — “जो भी बात हमें कहनी हो, आइए उसे समझदारी से कहें।” यहाँ bá और máa मिलकर बात को किसी एक हो चुकी घटना तक सीमित नहीं रखते, बल्कि संभावित या आगे कही जाने वाली बात के रूप में प्रस्तुत करते हैं। fi ọgbọ́n का आशय “समझदारी से” है। अंतिम í पहले सामने रखी गई बात की ओर लौटता है; हिंदी में उसी स्थान पर “उसे” समझना सहायक है।

इस वाक्य को केवल “धीरे बोलिए” न समझें। यह विषय-वस्तु, संयम और निर्णयशीलता की माँग करता है, न कि सिर्फ कम आवाज़ की।

५. लय और दोहराव का उद्देश्य समझें

समानांतर रचना, यानी पास-पास के वाक्यों को मिलते-जुलते ढाँचे में रखना, भाषण को यादगार बना सकती है। “हम यह चाहते हैं; हम वह चाहते हैं” जैसे हिंदी वाक्यों की तरह योरूबा में भी एक शुरुआत दोहराकर सामूहिक उद्देश्य उभारा जा सकता है। मगर दोहराव तभी उपयोगी है जब हर पंक्ति कुछ नया जोड़े।

प्रशस्ति और कहावत भाषण को समुदाय की स्मृति से जोड़ सकती हैं। वे सामान्य जानकारी देने वाले वाक्य नहीं होतीं: एक प्रशस्ति किसी व्यक्ति या वंश की पहचान जगाती है, जबकि कहावत किसी स्थिति को साझा अनुभव के प्रकाश में देखने का निमंत्रण देती है।

प्रसंग सहित उदाहरण

नीचे कुछ वाक्य समारोह के हैं और कुछ सामान्य औपचारिक बैठक के। इन्हें एक ही अनिवार्य भाषण के लगातार हिस्से न समझें।

योरूबा हिंदी अर्थ प्रसंग और प्रभाव
Ẹ máa kú ooo! आप सबको सादर अभिवादन! मंचीय अभिवादन; अंतिम ध्वनि खींचकर श्रोताओं से जुड़ने का भाव।
Ẹ káàárọ̀, ẹ̀yin àgbà. आदरणीय बड़ों, सुप्रभात। सुबह किसी समूह का सम्मानपूर्वक अभिवादन।
Mo kí gbogbo yín. मैं आप सभी का अभिवादन करता हूँ। सभी श्रोताओं को स्पष्ट रूप से संबोधित करना।
A dúpẹ́ lọ́wọ́ yín fún wíwá yín. हम आपके यहाँ आने के लिए आभारी हैं। आयोजकों की ओर से स्वागत और आभार।
Àwọn àgbà ìlú, ẹ jẹ́ kí èrò mi gbà ibùdó. नगर के आदरणीय बड़ों, मेरी बात को स्थान दीजिए। “विचार को ठिकाना मिलना” एक रूपक है; विचार स्वीकारने या सुनने का अवसर माँगा गया है।
Ẹ jọ̀ọ́, ẹ jẹ́ kí n sọ èrò mi. कृपया मुझे अपनी राय रखने दीजिए। बैठक में बोलने की विनम्र अनुमति।
Ẹ jẹ́ kí a fi sùúrù gbọ́ ara wa. आइए, हम धैर्य से एक-दूसरे की बात सुनें। तनाव के समय सामूहिक संयम का प्रस्ताव।
Ohun tí a bá máa wi, ẹ jẹ́ kí a fi ọgbọ́n wi í. जो भी बात हमें कहनी हो, आइए उसे समझदारी से कहें। चर्चा के लिए विवेकपूर्ण सीमा तय करना।
Bí àwọn àgbà ṣe sọ, ọwọ́ kan kò gbé ẹrù dé orí. जैसा बड़ों ने कहा है, एक हाथ से बोझ सिर पर नहीं चढ़ता। सहयोग की आवश्यकता समझाने के लिए कहावत।
A fẹ́ àlàáfíà; a fẹ́ ìṣọ̀kan. हम शांति चाहते हैं; हम एकता चाहते हैं। समान ढाँचा दोहराकर साझा लक्ष्य उभारना।
Kí ni a ó fi sílẹ̀ fún àwọn ọmọ wa? हम अपने बच्चों के लिए क्या छोड़ जाएँगे? श्रोताओं को भविष्य की जिम्मेदारी पर सोचने के लिए प्रेरित करना।
Ẹ ṣé fún àkíyèsí yín. ध्यान देने के लिए आपका धन्यवाद। भाषण या प्रस्तुति का संयत समापन।

पहले उदाहरण के ooo को सामान्य शब्द की स्थायी वर्तनी न मानें। यहाँ यह बोलते समय आवाज़ खींचने का संकेत है। इसी तरह Ẹ máa kú ooo! को हर अवसर का तैयार अभिवादन न बनाएँ: योरूबा में अभिवादन समय, गतिविधि और स्थिति से जुड़ सकता है। नए विद्यार्थी के लिए प्रसंगानुकूल, स्पष्ट अभिवादन अधिक भरोसेमंद है।

सामान्य गलतियाँ

१. बड़ों से भी परिचित संबोधन करना

  • अनुपयुक्त: किसी आदरणीय बुजुर्ग से O káàárọ̀.
  • उपयुक्त: Ẹ káàárọ̀. — “आपको सुप्रभात।”
  • क्यों: पहला वाक्य अपने-आप व्याकरण की गलती नहीं है; गलती इस संबंध के लिए उसका चुनाव है। हिंदी में भी “तुम” वाला वाक्य सही बन सकता है, फिर भी संबोधित व्यक्ति के लिए अनुचित हो सकता है।

२. सम्मानसूचक शुरुआत के बाद परिचित रूप लगा देना

  • अनुपयुक्त: सम्मानपूर्वक संबोधित उसी व्यक्ति से Mo dúpẹ́ lọ́wọ́ rẹ.
  • उपयुक्त: Mo dúpẹ́ lọ́wọ́ yín. — “मैं आपका आभारी हूँ।”
  • क्यों: जिस व्यक्ति के लिए आदरसूचक रूप चुना गया है, उसी के बारे में आगे भी उपयुक्त रूप बनाए रखें। यह वर्तनी की नहीं, संबंध और शैली की संगति का प्रश्न है।

३. अपनी अनुमति की जगह सामूहिक प्रस्ताव रख देना

  • आशय से अलग: अपनी राय रखने की अनुमति माँगते हुए Ẹ jẹ́ kí a sọ èrò wa. — “आइए, हम अपनी राय रखें।”
  • आशय के अनुरूप: Ẹ jẹ́ kí n sọ èrò mi. — “मुझे अपनी राय रखने दीजिए।”
  • क्यों: a / wa समूह की ओर संकेत करते हैं; n / mi यहाँ वक्ता की ओर। औपचारिकता के नाम पर “मैं” को हर जगह “हम” में बदलना आवश्यक नहीं है।

४. कहावत को उलटकर भी वही अर्थ समझना

  • गलत, यदि सहयोग वाली कहावत उद्धृत करनी हो: Ọwọ́ kan gbé ẹrù dé orí. — “एक हाथ बोझ सिर पर चढ़ाता है।”
  • सही: Ọwọ́ kan kò gbé ẹrù dé orí. — “एक हाथ से बोझ सिर पर नहीं चढ़ता।”
  • क्यों: kò नकार, यानी “नहीं”, व्यक्त करता है। उसे छोड़ देने से कहावत का संदेश उलट जाता है। याद की हुई कहावत में छोटे शब्दों को सजावट न समझें।

५. लिखित भाषण में स्वराघात मिटा देना

  • अपर्याप्त: E je ki a fi suuru gbo ara wa.
  • सावधानी से लिखा रूप: Ẹ jẹ́ kí a fi sùúrù gbọ́ ara wa. — “आइए, हम धैर्य से एक-दूसरे की बात सुनें।”
  • क्यों: स्वराघात, यानी बोलते समय अक्षर की ऊँची-नीची ध्वनि, और अक्षरों के नीचे के बिंदु योरूबा वर्तनी का हिस्सा हैं। संदेशों में चिह्न छूटे मिल सकते हैं, लेकिन भाषण की तैयारी करते समय उन्हें हटाना उच्चारण सीखने में बाधा डालता है।

प्रयोग संबंधी बातें

औपचारिकता का अर्थ हमेशा अलंकृत भाषा नहीं

किसी कार्यालय की छोटी बैठक में स्पष्ट अभिवादन, उचित संबोधन और एक सीधा विनम्र प्रस्ताव पर्याप्त हो सकता है। बड़े समारोह में वक्ता इनका विस्तार कर सकता है। हर बार लंबा आरंभ जोड़ना श्रोताओं का सम्मान करने के बजाय उनका समय लेना भी बन सकता है।

उदाहरण के लिए, Ẹ jọ̀ọ́, ẹ jẹ́ kí n sọ èrò mi. — “कृपया मुझे अपनी राय रखने दीजिए” — साधारण और सम्मानपूर्ण है। इसके स्थान पर कई कहावतें जोड़ देना अपने-आप उसे बेहतर नहीं बनाता। हिंदी के अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ भाषण की तरह, दुर्लभ शब्दों की अधिकता श्रोताओं और वक्ता के बीच दूरी भी बढ़ा सकती है।

प्रशस्ति का प्रयोग पहचान के साथ जुड़ा है

Oríkì व्यक्ति, परिवार, स्थान या अन्य विशिष्ट विषय की प्रशस्ति-परंपरा से जुड़ा रूप है। इसे हिंदी के “माननीय” जैसा सर्वसामान्य संबोधन न समझें। सही प्रशस्ति उचित प्रसंग में अपनापन और पहचान व्यक्त कर सकती है; किसी और की पंक्ति उठा लेना या उसका अर्थ जाने बिना दोहराना उचित नहीं है।

शुरुआत में पूरी प्रशस्ति रचने के बजाय उसकी भूमिका पहचानें। किसका नाम लिया जा रहा है? किन गुणों या घटनाओं की ओर संकेत है? श्रोताओं की प्रतिक्रिया कैसी है? विशिष्ट प्रयोग के लिए जानकार वक्ता का मार्गदर्शन लें।

आवाज़ की लय और शब्द का स्वराघात अलग हैं

सभा में वक्ता विराम ले सकता है, किसी पंक्ति पर जोर दे सकता है या अंतिम ध्वनि लंबी कर सकता है। फिर भी योरूबा के शब्दों के अपने स्वराघात रहते हैं। हिंदी की प्रश्नवाचक लय की नकल में पूरा वाक्य ऊपर उठा देना सुरक्षित उच्चारण-नियम नहीं है। पहले शब्दों के स्वर सीखें, फिर वक्ता के विराम और वाक्य की लय पर ध्यान दें।

आगे की बारीकियाँ

बड़ों का कथन उद्धृत करना और उसका उत्तरदायित्व

Bí àwọn àgbà ṣe sọ… — “जैसा बड़ों ने कहा है…” — वक्ता को अपने कथन के लिए एक सांस्कृतिक आधार देता है। यह केवल सजावटी शुरुआत नहीं है: आगे आने वाली बात को साझा अनुभव या परंपरा से जोड़ता है। फिर भी किसी नए विचार को “बड़ों की कही बात” बताना ठीक नहीं होगा।

परोक्ष कथन, यानी किसी की बात को अपने वाक्य में रखकर बताना, यहाँ महत्त्वपूर्ण है। Wọ́n sọ pé kí a ní sùúrù. — “उन्होंने कहा कि हमें धैर्य रखना चाहिए।” इसमें pé आगे कही गई बात को जोड़ता है और kí a… अपेक्षित कार्य बताता है। यह Wọ́n ní sùúrù. — “उनमें धैर्य है” — से बिल्कुल अलग अर्थ है। औपचारिक सभा में किसने क्या कहा और वक्ता स्वयं क्या प्रस्तावित कर रहा है, यह अलग रखना आवश्यक है।

रूपक को समझें, पर उसे शाब्दिक नियम न बनाएँ

Ẹ jẹ́ kí èrò mi gbà ibùdó. — “मेरी बात को स्थान दीजिए” — विचार को ठहरने की जगह मिलने की छवि बनाता है। यह रूपक है: किसी अमूर्त बात को ठोस चीज़ की तरह पेश करना। हिंदी में “मेरी बात पर गौर कीजिए” उसका उपयोगी व्यावहारिक अर्थ है; “मेरे विचार को शिविर लेने दीजिए” जैसा शब्दशः अनुवाद भ्रामक होगा।

ऐसी अभिव्यक्ति का प्रभाव उसकी विरलता और प्रसंग से भी आता है। हर विचार के साथ नया रूपक जोड़ने से अर्थ धुँधला पड़ सकता है। पहले स्पष्ट प्रस्ताव रखें; रूपक उसी को यादगार बनाए, उसका स्थान न ले।

प्रश्न जो सोचने को कहता है

Kí ni a ó fi sílẹ̀ fún àwọn ọmọ wa? — “हम अपने बच्चों के लिए क्या छोड़ जाएँगे?” — वास्तविक चर्चा का प्रश्न भी हो सकता है और अलंकारिक प्रश्न, यानी ऐसा प्रश्न जिसका उद्देश्य तत्काल उत्तर से अधिक विचार या प्रभाव पैदा करना हो।

केवल वाक्य देखकर दोनों में हमेशा निर्णय नहीं किया जा सकता। यदि वक्ता रुककर प्रतिक्रियाएँ माँगता है, तो उत्तर अपेक्षित हो सकता है; यदि वह तुरंत अपनी बात आगे बढ़ाता है, तो प्रश्न तर्क को दिशा दे रहा हो सकता है। मंचीय भाषा समझने में श्रोताओं की भूमिका भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी शब्दों की।

सम्मान के साथ असहमति

Mo bọ̀wọ̀ fún èrò yín, ṣùgbọ́n mo ní ìbéèrè kan. — “मैं आपकी राय का सम्मान करता हूँ, लेकिन मेरा एक प्रश्न है।” यह व्यक्ति का सम्मान बनाए रखते हुए आगे पूछने का रास्ता खोलता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वक्ता उस राय से सहमत है।

हिंदी के “आदर सहित एक बात पूछना चाहूँगा” की तरह, ऐसी शुरुआत तनाव घटा सकती है। लेकिन उसके बाद आरोप या अपमान हो तो शुरुआती सम्मानसूचक वाक्य पर्याप्त नहीं होगा। सार्वजनिक असहमति में कथन को व्यक्ति के चरित्र से अलग रखकर उसके कारण या परिणाम पर प्रश्न करना अधिक उपयोगी है।

अभ्यास के उपाय

  1. एक ही आशय के दो रूप तैयार करें। पहले किसी मित्र के लिए छोटा वाक्य लिखें, फिर किसी आदरणीय व्यक्ति या सभा के लिए। केवल “तुम” को “आप” न बदलें; अभिवादन, अनुमति और धन्यवाद भी जाँचें। दोनों का हिंदी अर्थ लिखकर देखें कि आपका मूल आशय बदला तो नहीं।
  2. एक मिनट का स्पष्ट भाषण बनाएँ। क्रम रखें: अभिवादन, अवसर का उल्लेख, एक प्रस्ताव, उसका एक कारण और धन्यवाद। पहली बार कोई कहावत न जोड़ें। दूसरी बार केवल एक जानी-पहचानी कहावत जोड़कर जाँचें कि उससे तर्क स्पष्ट हुआ या भाषण केवल लंबा हुआ। उच्चारण के लिए अपना वाचन रिकॉर्ड करें और जानकार वक्ता से स्वराघात जँचवाएँ।
  3. सुनते समय तीन चीजें चिन्हित करें। किसी सार्वजनिक भाषण में आदरसूचक संबोधन, बोलने या मिलकर कार्य करने का प्रस्ताव और दोहराया गया वाक्यांश खोजें। किसी प्रशस्ति का अर्थ स्पष्ट न हो तो उसे तुरंत अपने भाषण में न अपनाएँ; पहले उसके विषय और प्रसंग का पता करें।

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